नई दिल्लीः कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और मूल्य नियंत्रण के शिकंजे में जकड़ी छोटी दवा कंपनियों को केंद्र सरकार राहत देने के मूड में है। सरकार देश भर की करीब 5,000 छोटी फार्मा कंपनियों को मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर कर सकती है। इन कंपनियों का कारोबार 10 करोड़ रुपए के आसपास है।
सरकार छोटी फार्मा कंपनियों को राहत पहुंचाने के लिए यह कदम उठा सकती है। एमआरपी के आधार पर उत्पाद शुल्क लिए जाने और चीन से आयात किए जाने वाले कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण छोटी दवा कंपनियां इन दिनों आर्थिक संकट से गुजर रही हैं। एसएमई फार्मा इंडस्ट्रीज कन्फेडरेशन (स्पिक) ने दवा मंत्रालय से छोटी दवा बनाने वाली इकाइयों को मूल्य नियंत्रण पर छूट दिए जाने की मांग की थी।
स्पिक के जनरल सेक्रेटरी जगदीप सिंह ने बताया, 'सरकार ने हमें इस बात का आश्वासन दिया है कि वह हमारे प्रस्ताव पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी।' उन्होंने कहा कि छोटी कंपनियों की तुलना बड़ी कंपनियों से नहीं की जानी चाहिए। सिंह ने बताया, 'एमआरपी के आधार पर उत्पाद शुल्क लिया जाए तो इससे कीमतें काबू में रहती हैं। हालांकि, सिप्ला जैसी बड़ी कंपनियां मुक्त उत्पाद शुल्क श्रेणी के तहत नॉन शेड्यूल दवाओं का निर्माण करती हैं और ग्राहकों से ज्यादा दाम वसूलती हैं। उदाहरण के तौर पर एक्साइज फ्री जोन में काम कर रही इकाइयों को सेट्रीजिन की 10 गोलियों की कीमत दो रुपए लेनी चाहिए। हालांकि, सिप्ला इसे 36 रुपए में बेचती है।' जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में लगी इकाइयों को एक्साइज फ्री जोन में रखा गया है।
हालांकि एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईटी से कहा कि सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव के बारे में फिलहाल विचार नहीं कर रही है। नैशनल फार्मास्युटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) पहले ही दवाओं के दाम बढ़ाने से इनकार कर चुका है। फार्मा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों का कहना है कि निश्चित रूप से ऐसी किसी छूट से इंडस्ट्री के कुछ हिस्से को राहत मिलेगी।
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ फार्मास्युटिकल्स प्रोड्यूर्स ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी तपन राय ने कहा, 'अगर सरकार ऐसा कोई प्रस्ताव लाती है, तो यह पूरे उद्योग जगत पर एक समान रूप से लागू होना चाहिए। किसी विशेष वर्ग को दी गई छूट असंगत होगी।'