नई दिल्ली : इन दिनों मुंबई के दवा रीटेलरों और स्विस दवा कंपनी नोवार्टिस और उसकी सहयोगी इकाई सैंडोज के बीच कारोबारी जंग शुरू हो चुकी है। दोनों के बीच संघर्ष इतना आगे बढ़ चुका है कि मुंबई के 7,000 रीटेलरों और थोक विक्रेताओं ने इन दोनों कंपनियों की 198 दवाओं का बहिष्कार शुरू कर दिया है। दवा विक्रेता और कंपनी के इस बीच यह मतभेद दवाओं के मार्जिन को लेकर है। दरअसल, दोनों कंपनियां ऊंचे मार्जिन वाली दवाइयां सीधे ग्राहकों को बेचती हैं जबकि विक्रेता इसका विरोध कर रहे हैं।
दवा विक्रेताओं के विरोध के बावजूद कंपनियों ने अपनी नीति नहीं बदली तो रीटेलरों को बहिष्कार का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। रीटेलरों का आरोप है कि ये दोनों कंपनियां ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) का उल्लंघन कर रही हैं और ग्राहकों को उस कीमत पर दवाएं बेच रही हैं, जिसमें उनका मार्जिन भी शामिल है।
ये दोनों कंपनियां पिछले कुछ सालों से ये दवाइयां सीधे ग्राहकों को बेच रही हैं। हालांकि, इस मतभेद को शुरू में बातचीत से निपटाने की कोशिश की गई थी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हालांकि, इस पूरे मामले में नोवार्टिस की प्रवक्ता ने गुरुवार को कहा, 'हम लोग इस मुद्दे पर ट्रेड एसोसिएशन से बातचीत कर रहे हैं।' रीटेल और डिस्पेंसिंग केमिस्ट एसोसिएशन के ज्वाइंट कोऑर्डिनेशन कमेटी और फार्मास्युटिकल थोक विक्रेता एसोसिएशन के प्रेसिडेंट दिलीप मेहता ने को बताया, '1 अप्रैल से मुंबई के सभी थोक और खुदरा दवा विक्रेता नोवार्टिस और सैंडोज की दवाइयां बेचनी बंद कर चुके हैं।
कंपनी ने ऊंचे मार्जिन वाली इन दवाइयों को सीधे ग्राहकों को नहीं बेचने का वादा किया था लेकिन बाद में अपनी बात से मुकर गई।' इन दोनों संगठनों ने यह भी धमकी दी है कि अगर कंपनियों ने अपनी नीति में बदलाव नहीं किया तो वे देश भर में उनकी दवाइयों का बहिष्कार शुरू कर देंगे। मेहता का यह भी कहना है कि दुकानदारों के हिस्से का मार्जिन खुद लेने के अलावा ये दोनों कंपनियां डीपीसीओ का भी उल्लंघन कर रही हैं क्योंकि ये ग्राहकों को सीधे दवाइयां बेच रही हैं जबकि दवाओं की कीमतों में रीटेल मार्जिन भी शामिल है। उन्होंने कहा, 'इससे रोगियों को दवाएं मिलने और उसे खरीदने में भी काफी दिक्कत आती है।'
हालांकि, इस मामले में बगैर कोई आंकड़ा मुहैया कराए नोवार्टिस का कहना है कि वे लोग डीपीसीओ सहित देश के भी कानूनों का पालन कर रहे हैं। कंपनी का कहना है कि ये दवाइयां सुपर स्पेशिएलिटी प्रोडक्ट हैं और ये देश भर में कई केंद्रों पर हाई स्पेशलाइज्ड डॉक्टरों के जरिये उपलब्ध है ताकि किसी भी रोगी को कोई दिक्कत न हो। भारतीय कानून के मुताबिक जिन दवाओं की कीमतें सरकार तय करती हैं उन पर स्टॉकिस्टों को 8 फीसदी और रीटेलरों को 16 फीसदी मार्जिन मिलता है।
लेकिन जिन दवाओं की कीमतें इससे अलग तय होती हैं उन पर स्टॉकिस्टों और रीटेलरों को क्रमश: 10 फीसदी और 20 फीसदी मार्जिन मिलता है। मेहता का कहना है कि कंपनी की नीति और उनका एकाधिकार गलत है। इससे स्टॉकिस्टों और रीटेलरों को साल भर में 15 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। नोवार्टिस की प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी की डायरेक्टर मार्कटिंग की रणनीति मरीजों के हक में है। उनका कहना है, 'दूसरी दवा कंपनियों की तरह की नोवार्टिस अपनी सुपर स्पेशिएलिटी प्रोडक्ट को सीधे मरीजों तक पहुंचाती है।' अगर इसे ठीक से न रखा जाए तो रोगियों की जान बचाने के बजाय ये नुकसान भी पहुंचा सकती हैं।
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